हिरण्यकश्यप प्राचीन भारत का एक राजा था जो कि राक्षस की तरह था. दैत्य होने के बाद भी वह खुद को ईश्वर से बड़ा समझता था. वह चाहता था कि लोग केवल उसकी पूजा-अर्चना करें. एक और कारण था जिसमें भगवान विष्णु ने हिरण्यकश्यप के छोटे भाई को मृत्यु दंड दिया, जिसका बदला वह उनसे लेना चाहता था. भगवान विष्णु से बदला लेने के लिए उसने सालों तक प्रार्थना की आखिरकार उसे वरदान मिला, लेकिन इससे हिरण्यकश्यप खुद को भगवान समझने लगा और लोगों से खुद की भगवान की तरह पूजा करने को कहने लगा.
इस दुष्ट राजा का एक बेटा हुआ, जिसे हम प्रह्लाद के नाम से जानते हैं, जो कि भगवान विष्णु का परम भक्त था. प्रह्लाद को भक्ति अपनी मां से विरासत के रूप में मिली थी. प्रह्लाद ने अपने पिता का कहना कभी नहीं माना और वह भगवान विष्णु की पूजा करता रहा. बेटे द्वारा अपनी पूजा न करने से नाराज उस राजा ने अपने बेटे को मारने का निर्णय किया. उसे मारने के लिए हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन की मदद ली. उसने अपनी बहन होलिका से कहा कि वो प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठ जाए क्योंकि होलिका को वरदान प्राप्त था कि अग्नि उसका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकती. होलिका आग में जल नहीं सकती थी. उनकी योजना प्रह्लाद को जलाने की थी, लेकिन उनकी योजना सफल नहीं हो सकी क्योंकि प्रह्लाद सारा समय भगवान विष्णु का नाम लेता रहा और बच गया पर होलिका जलकर राख हो गई.
होलिका की ये हार बुराई के नष्ट होने का प्रतीक है. इसके बाद भगवान विष्णु ने हिरण्यकश्यप का वध कर दिया. इसलिए होली का त्योहार, होलिका की मौत की कहानी से जुड़ा हुआ है. इसके चलते भारत के कुछ राज्यों में होली से एक दिन पहले बुराई के अंत के प्रतीक के तौर पर होलिका का पुतला चौराहों पर रखा जाता है और उस जलाया जाता है. जो कि बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देता है.